Saturday, 7 July 2018

5 रीजनल फिल्में जो बॉलीवुड को नहीं बनानी चाहिए

बॉलीवुड में एक समय सिर्फ गाने ही चोरी हुआ करते थे, लेकिन फिर इन्हें इंस्पायर्ड कहा जाने लगा। ये एक तरह से किसी पुरानी चीज़ को नए पैकेट में पेश करने का नया नाम था।

सिर्फ गाने ही नहीं, बॉलीवुड में फिल्में भी चोरी या इंस्पायर्ड होती है। यहां मैं ये कहना चाहूँगा की बॉलीवुड ने एक फ़िल्म रीमेक की है जिसका इंतज़ार फैंस को बेसब्री से रहेगा।

अब चूंकि मराठी फ़िल्म सैराट, धड़क के रूप में हमारे बीच जल्द आने वाली है। उसके गानों और फ़िल्म का ट्रेलर देखकर मैं यही कहूंगा कि बॉलीवुड को कभी भी रीजनल क्लासिक को नहीं खराब करना चाहिए। तो इस बात को ध्यान में रखकर, मैंने ये सोचा कि क्यों ना उन 5 रीजनल फिल्मों के बारे में बात की जाए जिन्हें बॉलीवुड को नहीं बनाना चाहिए:

5 फैनड्री (मराठी)




ये फ़िल्म भी नागराज मंजुले की ही है और सैराट की तरह ही इसमें भी एक अलग जाति, बड़े-छोटे के स्तर को दिखाया गया है। एक तरफ जहां सैराट कॉलेज पर आधारित है तो फैनड्री स्कूल पर।

इस फ़िल्म में भी नागराज ने एक बेहद बड़ा सवाल उठाया है पर अगर इसे बॉलीवुड में दिखाया गया तो ये मेलोड्रामा हो जाएगा।

इसलिए बॉलीवुड इस फ़िल्म को ना बनाए।

4 कोर्ट (मराठी)





ये एक ऐसी कहानी है जिसे देखने भर से ही आपको समझ आ जाता है आखिरकार क्यों मराठी सिनेमा बॉलीवुड से आगे चल रहा है।

ना कोई एक्शन, ना बेवजह की चीज़ें, बस एक साधारण कहानी पर उसके बाद भी आप इस फ़िल्म से नज़रें नहीं हटा पाएंगे और अगर आप इस फ़िल्म में कोर्ट की कहानियाँ, उससे जुड़े सवाल और उसकी प्रक्रिया को समझ सकेंगे तो आप भी इस फ़िल्म के मुरीद हो जाएंगे।

3 पंजाब 1984 (पंजाबी)




1984 के दौरान पंजाब में भड़के दंगों और उस दौरान हुए नरसंहार के साथ साथ किस तरह बच्चों, बड़ों, बुजुर्गों और औरतों के साथ दुर्व्यवहार हुआ, इसको दर्शाती है ये फ़िल्म।

इसके साथ साथ इस फ़िल्म में ये भी दिखाया है कि किस तरह उस समय लोग गलत रास्तों पर निकल पड़े थे। दिलजीत दोसांझ और सोनम बाजवा की इस फ़िल्म में किरन खेर की एक अहम भूमिका है।

अगर बॉलीवुड इसे बनाएगा तो मेलोड्रामा बना देगा इसलिए अगर वो इस फ़िल्म को नहीं बनाए तो ये ना सिर्फ इस फ़िल्म बल्कि लोगों पर बड़ी मेहरबानी होगी।

2 विसरनै (तमिल)



ये फ़िल्म भारत की तरफ से ऑस्कर्स में जाने वाली फिल्म थी। अब इसके बाद क्या कुछ कहना बाकी है?

ये तमिल में बनने वाली ऐसी फिल्म है जिसको देखने के बाद आपके रोंगटे कांपने लग जाएंगे। लॉकअप नाम की किताब पर बनी ये फ़िल्म एक सच्ची घटना पर आधारित है जिसमें 4 में से जिंदा बच गए एक लड़के ने अपनी आप बीती बताई है और ये भी कि इन सबकी ज़िन्दगी में क्या गुज़रा।

इसे अगर बॉलीवुड ने बनाया तो ज़बरदस्ती का म्यूजिक डालकर लोगों को भावुक किया जाएगा, लेकिन इस तमिल फ़िल्म में उसकी जरूरत नहीं है, अभिनय ही काफी है।

1 पाथेर पांचाली (बंगाली)



सत्यजीत रे की इस फ़िल्म के बारे में कुछ कह सकूं अभी या कभी भी मैं इस योग्य नहीं हो पाऊंगा।

ये वो फ़िल्म है जिसे देखने के लिए विदेशी तक आज भी लालायित हैं।

प्रिय बॉलीवुड तुम इसे मत बनाना वरना तुम गुड़ का गुड़ गोबर करने में समय नहीं लगाओगे।

Thursday, 5 July 2018

बम्बई और फूड: कमाल का कॉम्बिनेशन

खाना हम सबको जोड़ता है, और इसकी एक मिसाल है हमारा अद्भुत कल्चर जो हर कुछ किलोमीटर पर बदलता है और आज मैं कुछ बेहद प्रसिद्ध मुम्बईया खाने के बारे में चित्रों के माध्यम से बताने वाला हूँ।

ये आर्टिकल सिर्फ इसलिए है क्योंकि मुझे मुम्बई और खाने दोनों से प्यार है। तो अगर आप मुम्बई में हैं तो इन जगहों पर ज़रूर जाइए:











Saturday, 30 June 2018

4 शब्द जिनको लखनऊ में बोलने का अपना ही मज़ा है


अगर आप लख़नऊ के रहने वाले हैं या कभी यहाँ आए हैं तो आपको ये मालूम होगा कि इस शहर की आबो हवा में एक अलग ही मज़ा है। वो चौक की गलियाँ, और वो सुबह सुबह दही जलेबी का मज़ा। वो सुबह उगते सूरज को गोमती या मरीन ड्राइव से देखना और वो गंज की अपनी खुशबू।

जी हाँ, ये सोचकर ही कितना अच्छा लग रहा है इसका अंदाजा मैं लगा सकता हूँ, और अगर आप वाकई में यहाँ कुछ वक़्त दे चुके हैं तो यहाँ के मज़े को कभी नहीं भूल सकेंगे। लख़नऊ आपके अंदर कुछ इस तरह बस जाता है, जैसे आपकी पहली गर्लफ्रेंड से जुडी यादें।

जितनी खूबसूरत यहाँ की आबो हवा और उसके पकवान है, उतने ही प्यारे यहाँ के मोनुमेंट्स हैं। पर आप ये कह सकते हैं कि मोनुमेंट्स तो हर शहर में होते हैं, और मैं इस बात से इंकार नहीं कर सकता, लेकिन हिंदी ही नहीं, व्याकरण में भी कुछ ऐसे शब्द हैं जो आपको सिर्फ लख़नऊ में ही सुनने को मिलेंगे, और मैं यहाँ आपके नज़र उन्हें करता हूँ:

4 भौकाल



अगर आप लख़नऊ में हैं और आपने ये शब्द नहीं सुना तो आपका लखनऊ में होना बेकार हो गया। ये एक ऐसा शब्द है जिसका इस्तेमाल आपको हर बंदा करता हुआ दिखेगा। इस शब्द के बिना लखनऊ वाले का वाक्य ही पूरा नहीं होता तो फिर आप इसे ना सुने ऐसा नहीं हो सकता।

3 तफरी


दिल्ली वाले चाहे जितना अपने टाइमपास और मुंबई वाले अपनी फालतुगिरी पर नाज़ करें, जो मज़ा तफरी कहने में है वैसा कोई दूसरा नहीं। ये एक ऐसा शब्द है जिसको सुनते ही लगता है जैसे कोई बड़ा काम काम हो रहा है ना कि 'टाइमपास'।

2 कंटाप

आप चाहे कितने भी चांटें लगाने या कान के नीचे बजाने की बात करें, जो सौंदर्य कंटाप शब्द सुनने में है वैसा दूसरा कहीं नहीं। जी हाँ, सोचिए आपको कोई परेशान कर रहा हो और आप उससे कहें कि हम चांटा मार देंगे?

कितना नीरस सा नहीं लगता? वहीँ ये सोचिए,'तुमने ज़्यादा तफरी की तो हम कंटाप धर देंगे' में कितना आनंद आ रहा है।

1 छीछालेदर


जब लाइफ की लगी हो वात तो भला कैसे करेंगे आप ठाठ, लेकिन इतना बड़ा वाक्य बोलने की क्या ज़रूरत है जब आप सिर्फ एक शब्द में कह सकते हैं वो सारी बात, और वो शब्द है,'छीछालेदर'।

एक शब्द और आपकी पूरी कहानी सामने वाले को समझ में आ जाती है। 

तो फिर अपना और सामने वाले का समय बचाइए, और मुस्कुराइए, क्योंकि आप लखनऊ में हैं।

Friday, 29 June 2018

5 कारण जिसकी वजह से आपको संजू फिल्म देखनी चाहिए

`Read this blog in English at: http://themstudio.blogspot.com/2018/06/5-reasons-why-sanju-is-must-watch-for.html


संजू फिल्म आज सबके बीच आ ही गई। अब आप इस फिल्म को पसंद करें या नापसंद, लेकिन इस बात में कोई दोराय नहीं है कि संजय दत्त की कहानी को दिखाने के प्रयास में राजकुमार हिरानी ने काफी मेहनत की है।

संजू असल में संजय दत्त की ज़िंदगी पर आधारित है जिसने काफी बड़े पहलुओं को बेहद सजीव तरिके से दिखाया है। अगर आप संजू को नापसंद करते हैं तो आपको लगेगा कि इस फिल्म से संजय दत्त ने खुद को साफ़ बताने की कोशिश की है, जबकि अगर आप संजू के फैन हैं तो आपको इसका बिल्कुल उलट लग सकता है।

ये सोचना ज़रूरी है कि आखिरकार एक इतने बड़े परिवार का लड़का, एक इतनी मुश्किल ज़िन्दगी में कैसे पड़ गया। ये तो आप विवेचना करें, लेकिन हम आपको बताते हैं उन5 कारणों के बारे में जिसकी वजह से आपको ये फिल्म देखनी चाहिए: 

5 कहानी


संजय दत्त की कहानी ऐसी है कि उसे समझने में काफी वक़्त लगेगा। एक लड़का जो इतने बड़े परिवार में जन्मा, एक अदाकार रहा, वो आखिरकार इस तरह की परेशानियों में कैसे पड़ गया।

उनकी ज़िन्दगी काफी कश्मकश में गुज़री लेकिन उसके बावजूद उन्होंने इसे बेहद सलीके से गुज़ारा और उसे अब परदे पर भी बताना चाहा। ये बात देखकर अच्छा लगा कि कोई व्यक्तिगत चीज़ों को भी पूरी शिद्द्त से बताना चाहता था।

अगर आप वाकई में कोई अच्छी कहानी देखना चाहते हैं तो इस फिल्म को ज़रूर देखें।

4 एक्टिंग


रनबीर कपूर ने संजय दत्त को पर्दे पर दिखाने के लिए जिस तरह की मेहनत की वो साफ़ दिखाई देती है। संजय दत्त का बोलने का अंदाज़ हो या फिर चलने का, रनबीर कपूर ने पूरी कोशिश की है कि वो दत्त जैसे दिखें, बोलें, और काफी हद तक वो उसमें सफल भी रहें हैं।

उनका जेल के दिनों को बखूबी दिखाना इस बात को साबित करता है कि वो एक माहिर एक्टर हैं जिन्होंने उतना ही दिखाया जितना या तो स्क्रिप्ट या डायरेक्टर की डिमांड थी।

3 कास्ट


अब जैसे क्रिकेट में होता है कि स्ट्राइकर सिर्फ तभी अच्छे से खेल सकता है जब दूसरे छोर पर कोई उनका साथ निभाता रहे और इस फिल्म में वो काम सपोर्टिंग कास्ट ने किया है। परेश रावल जी ने दत्त साहब का किरदार बखूबी निभाया तो वहीँ मनीषा कोइराला ने नरगिस जी का किरदार। दीया मिर्ज़ा मान्यता दत्त के तौर पर काफी प्रभावशाली थीं, और जिम सरभ उनके मित्र मिस्त्री के किरदार के रूप में प्रभावशाली थे।

इन सबके बीच विकी कौशल ने अपने एक्टिंग के कौशल का लोहा हर सीन में मनवाया है। उनके आने से फिल्म में एक नई जान आ गई और फिल्म बेहद अच्छी लगी।

2 एग्ज़िक्यूशन


जब ज़िन्दगी इतनी बड़ी हो तो ये देखना ज़रूरी होता है कि हम भला किस चीज़ को दिखाएं और किसे रहने दें। इस चीज़ में इस फिल्म के डायरेक्टर, राइटर और कैमरामैन ने महारत हासिल कर रखी थी।

उन्होंने सिर्फ उन्हीं पलों को दिखाया जो ज़रूरी थे, और उन चीज़ों को हटा दिया जिनकी ज़रुरत या तो नहीं थी या जिसकी वजह से फिल्म एकदम मेलोड्रामा लगे। हालांकि ये कहना कि इस दौरान आपकी आँखें नम ना हों ऐसा मुमकिन नहीं है।

1 डायरेक्शन


जब ज़िन्दगी इतनी बड़ी हो तो उसे सही से सिर्फ एक ऐसा डायरेक्टर ही दिखा सकता है जिसे इसमें महारत हासिल हो, और हिरानी साहब में वो हुनर है कि वो इस चीज़ को दिखा सकें।

उन्होंने जिस तरह से संजू की कहानी को अभिजात जोशी के साथ पन्नों के साथ साथ स्क्रीन पर उतारा है वो काबिल-ए-तारीफ है।

अगर आप अच्छा सिनेमा देखना चाहते हैं तो इस फिल्म को ज़रूर देखें।

लेखक: अमित शुक्ला

Thursday, 28 June 2018

3 कारण जिनकी वजह से सत्यमेव जयते बिगड़ सकती है



सत्यमेव जयते एक ऐसी फिल्म है जिसका इंतज़ार काफी समय से लोग कर रहे थे, और अब जब उसका ट्रेलर सबके बीच है, तो ये कहना कि उसने निराश किया कोई अतिश्योंक्ति नहीं होगी। इस ट्रेलर से ये बात तो साबित हो गई कि इसमें भी निखिल अडवाणी की पिछली फिल्मों की तरह देशभक्ति दिखाई जाएगी, लेकिन एयरलिफ्ट, बेबी सरीखी ज़बरदस्त फिल्मों के मुकाबले, इस फिल्म के ट्रेलर को देखकर निराशा ही हाथ लगी।

हो सकता है कि आप मेरी बातों से इत्तेफाक ना रखें लेकिन इस फिल्म में क्या सही नहीं लगा, आइए आपको बताते हैं:

3 सिर्फ एक्शन


एक ट्रेलर में हर वो मसाला होना चाहिए जो आपको उस फिल्म की तरफ आकर्षित करे, लेकिन इस फिल्म के ट्रेलर में सिर्फ एक्शन ही था, और कुछ नहीं। कहीं कोई पिट रहा था, कहीं कोई पेट्रोल पम्प जल रहा था, और फिर कुछ हद तक ए वेडनसडे की झलक भी दिखी।

हालांकि ये कहना ज़रूरी है कि जहाँ एक तरफ ए वेडनसडे में एक्शन के साथ साथ कुछ बेहद अच्छे प्लॉट्स थे, इस फिल्म के ट्रेलर की शुरुआत एक्शन और अंत एक्शन से हुआ। एक्शन अच्छी चीज़ है, लेकिन उसे इतना भी मत डालिए कि बोरियत होने लगे।

फ़ोर्स सीरीज़ में वो ठीक लगता है, पर इसमें ऐसा सही नहीं लग रहा। अगर फिल्म किसी तरह इस बात को साबित कर सके तो अच्छी बात है।

2 डायलॉग्स


अब ऊपर लगी तस्वीर के दौरान मनोज बाजपेई सरीखे एक्टर को अगर इस तरह का डायलाग बोलना पड़े कि कानून को हाथ में लेने का हक सिर्फ कानून को होता है, या फिर जॉन का वो डायलाग कि इस 2  टके की जान लेने के लिए 9 मिमी की गोली नहीं 56 इंच का सीना चाहिए, तो आप य सोच सकते हैं कि फिल्म में और किस स्तर के डायलॉग्स का इस्तेमाल किया गया होगा।

आप एक उच्च स्तर के अदाकार हैं और ऐसे डायलॉग्स सुनकर ही लग रहा है कि फिल्म की कहानियों में डायलॉग्स पर कुछ ख़ास काम नहीं किया जा रहा है। एक तरफ एयरलिफ्ट और स्पेशल 26 सरीखी फिल्म्स हैं, जिनको आज भी देखने का मन करता है, लेकिन अगर सही मायनो में फिल्म के डायलॉग्स का स्तर ये है तो सोचना पड़ेगा कि इस समय फिल्म का स्तर क्या चल रहा है।

1 बेवजह अग्रेशन


इस फिल्म के ट्रेलर को देखते समय मुझे तिरंगा फिल्म से राजकुमार साहब का वो डायलाग याद आ गया जो उन्होंने नाना पाटेकर जी को कहा था,'गर्मजोशी अच्छी चीज़ है वागले, लेकिन हर जगह काम नहीं आती।'

यही बात इस फिल्म में दिखाए गए अग्रेशन पर भी लागू होती है। आजकल हर एक्टर बॉडी बिल्डर है और हर एक्टर एक्शन कर सकता है तो आप इतना ज़्यादा अग्रेशन दिखाने की जगह अगर उसको थोड़ा था स्पष्ट रूप से दर्शाते तो एक अच्छी बात होती।

वो जैसे कहते हैं ना कि ज़्यादा आंच और ज़्यादा खानसामे किसी भी खाने का स्वाद बिगाड़ सकते हैं, कुछ वही हाल इस अग्रेशन की वजह से इस फिल्म का ना हो जाए।

लेखक: अमित शुक्ला

Monday, 25 June 2018

5 कारण जिनकी वजह से गोल्ड का ट्रेलर आपको पसंद आएगा

To read this article in English, Visit: http://themstudio.blogspot.com/2018/06/5-reasons-which-confirm-that-gold.html?m=1

अक्षय कुमार की बहुप्रतीक्षित फिल्म,'गोल्ड' का ट्रेलर अब आपके सामने आ चुका है। फिल्म की कहानी तपन दास नाम के एक शख्स की कहानी है जिसको हॉकी से काफी प्रेम होता है और वो एक आजाद देश में अपने इस पसंदीदा खेल को खेलना चाहता है।

ट्रेलर के दौरान ये बात भी स्पष्ट हो जाती है कि ये कहानी उनके जद्दोजहद से जुडी हुई है और उससे प्रेरित है। वैसे ये देखने वाली बात है कि महज एक महीने पहले यानी 13 जुलाई को हॉकी लेजेंड संदीप सिंह की ज़िन्दगी पर आधारित फिल्म 'सूरमा' रिलीज़ हो रही है।

इसकी वजह से ये देखना होगा कि कुछ ज़्यादा के प्रयास में कहीं ये दोनों फिल्में एक दूसरे के लिए पूरक बनने की जगह उसका बिज़नस ना खराब कर दे। खैर इसकी विवेचना करने के लिए अभी एक लम्बा वक़्त पड़ा हुआ है। आइए नज़र डालते हैं उन 5 चीज़ों पर जो इस ट्रेलर में अच्छी थीं:

5 अनसुनी कहानी


अब अगर आपसे कोई कहे कि अमिताभ बच्चन के बारे में आज आपको बताते हैं, तो आप खुद उसे इतना बता देंगे कि वो हैरान हो जाएगा। असल में उनकी ज़िन्दगी का हर पहलू अब सबके बीच है, लेकिन कुछ कहानियाँ ऐसी भी होती हैं जिनके बारे में लोग नहीं या अधूरा जानते हैं, और ऐसी कहानियों को बताने में जो आनंद आता है वो कमाल होता है।

4 जावेद, सचिन-जिगर की जोड़ी


इस ट्रेलर के दौरान आपको कुछ बेहद अच्छे शब्द और कुछ बेहद सुन्दर धुनें सुनने को मिलेंगी। अगर आप ध्यान देंगे तो ये पाएंगे कि इसमें जावेद अख्तर के अलफ़ाज़ और सचिन जिगर के म्यूज़िक की झलक आपको साफ़ सुनाई देगी।

अब जब इतने अद्भुत लिरिक्स राइटर और कंपोजर एक साथ आए, तो आपको कुछ अच्छा मिलेगा, इसमें कोई दोराय नहीं।

3 अक्षय कुमार की एक्टिंग


आप पिछले कुछ वक़्त में अक्षय कुमार की एक्टिंग और फिल्म्स को देखेंगे तो ये पाएंगे कि वो कुछ बेहद अच्छी कहानियों पर काम कर रहे हैं, जैसे कि टॉयलेट-एक प्रेम कथा, पैडमैन और अब गोल्ड।

इस फिल्म के साथ उन्होंने एक ऐसा किरदार निभाने की कोशिश की है, जो उन्होंने पहले कभी नहीं किया, और वो है एक बंगाली किरदार। 

ये उनके लिए काफी चुनौतीपूर्ण रहा होगा, क्योंकि किसी भी प्रान्त या राज्य की भाषा और वेशभूषा को संभालना, कोई आसान काम नहीं खासकर जब वो आज़ादी से पहले का हो। एक चूक और लोग आप पर भावनाएं आहत करने का आरोप लगा सकते हैं।

मोनी रॉय


अबतक इच्छाधारी नागिन और कुछ और किस्म के काम करने वाली मोनी रॉय ने इस फिल्म के साथ बॉलीवुड में डेब्यू किया है। उनका बंगाली होना उनके किरदार के लिए फायदेमंद रहा है और ये बात इस सीन में उनकी भाषा को सुनकर ही कहा जा सकता है।

अब इस फिल्म में उनका काम काफी अच्छा होगा ऐसी उम्मीद हम करते हैं, पर असलियत तो इस फिल्म के रिलीज़ पर ही पता चलेगी।

1 रीमा कागती का निर्देशन


रीमा कागती ने इससे पहले भी 2 फिल्मों का निर्देशन किया है जिसमें हनीमून ट्रैवल्स प्राइवेट लिमिटेड और तलाश शामिल हैं। ये दोनों ही फिल्में अच्छी थीं। अब भले ही तलाश को लोगों ने पसंद नहीं किया हो, लेकिन इस बात से तो कोई इंकार नहीं कर सकता कि वो फिल्म भी निर्देशन के लिहाज से अच्छी ही थी।

उम्मीद है गोल्ड उनके करियर का गोल्ड साबित होगी।

इस फिल्म के ट्रेलर को यहाँ देखें:

Sunday, 24 June 2018

भरोसा: शब्द छोटा, मायने बड़े


एक बच्चा जब अपनी माँ की गोद में सर रखे होता है तो उसे ये पता होता है कि दुनिया में चाहे कुछ हो जाए, पर उसे इस गोद से धोखा नहीं मिलेगा। एक बेटा जब बाप के साथ होता है तो उसे ये मालूम होता है कि उसकी ताकत उसके साथ है।

ऐसा विश्वास कैसे आता है? ये भरोसा कैसे पनपता है? ज़ाहिर सी बात है कि एक इंसान दूसरे इंसान के काम और उसके व्यवहार से इस बात तक पहुँचता है। वो भरोसा एक इंसान को दूसरे की तरफ सिर्फ इस वजह से आता है क्योंकि उसे इस बात का यकीन है कि उसके साथ बैठा, खड़ा, बातचीत कर रहा इंसान उसका अहित नहीं करेगा।

भरोसा एक छोटा शब्द लग सकता है लेकिन हर किसी के लिए इसके मायने अलग हैं। कोई खुद पर भरोसा करता है, कोई लोगों पर भरोसा नहीं करता।

ये एक ऐसी चीज़ है जिसकी कोई कीमत नहीं है, पर ये सबसे अनमोल है। आप किसी दुकानदार, किसी डॉक्टर के पास सिर्फ तब ही जाएंगे जब आप इस बात का यकीन कर सकेंगे कि उस फलां इंसान के साथ आपको कोई नुकसान नहीं है।


अगर डॉक्टर की भाषा में कहा जाए तो ये एक डिसऑर्डर है जो बेहद शूक्ष्म है, लेकिन अगर इसपर ध्यान ना दिया गया तो ये बेहद विकराल रूप धारण कर सकता है।

मेरे साथ एक फ़िल्म की स्क्रिप्ट पर साथ रहे मेरे साथी इस बात को समझ सकेंगे। आखिरकार ये एक तरह से सनिकजोफेनिया तक पहुँचने की शुरुआत भर है, और भले ही ये सही ना हो, लेकिन इस बात से कोई दोराय नहीं कि कोई भी बीमारी नासूर बन सकती है अगर उसपर ध्यान नहीं दिया जाए।

एक बात जो यहां समझने वाली है वो ये कि इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम सब खुद से इतने उलझे हुए हैं कि बातों और रिश्तों को सुलझाने का कोई रास्ता नज़र नहीं आता। आखिरकार इतनी भागदौड़ किसलिए? डॉक्टर को बताने या समझाने के लिए?


ये बात ज़रूरी है कि हमारे सारे रास्ते खुले हों और हमारी सोच एकदम स्पष्ट ताकि ये भरोसा आप दूसरे पर रख सकें। हमारी लोगों के बारे में चुगली करने की आदत भी इसको काफी हवा देती है, लेकिन अगर उसी चुगली को हम अपनी उन्नति की तरफ मोड़ दें तो ज़िन्दगी आज भी 'गुलज़ार' है।

Friday, 22 June 2018

गुस्ताख: एक शार्ट फिल्म


सआदत हसन मंटो की शार्ट स्टोरी "सरकंडों के पीछे" से रूपांतरित गुस्ताख एक शार्ट फिल्म है।

इस शार्ट फ़िल्म की खासियत है उसका प्रदर्शन। शुरुआत होती है तो हमें लगता है कि ये उस इंसान की कहानी है जो एक कार से आती है।

पलक झपकते ही हमारी कहानी की नायिका पारुल गुलाटी की एंट्री होती हैं। वो खुद को सँवार रही हैं, कि तभी उन्हें रोटी समझने वाला एक शख़्स आता है, और फिर जब उन्हें एक इंसान से इश्क़ होता है या यूं कहें कि लगाव होता है तो वो अपने उसी सवाल को उसके सामने भी रख देती हैं।

एक तरफ है वो रोटी जो पेट की आग बुझाती है तो दूसरी वो जो जिस्म की। आखिरकार इस कशमकश के बीच अपने सवालों और अंतर्द्वंदों से जूझती पारुल जब वो सवाल पूछती है तो एक पल को वो सवाल सिर्फ हिम्मत से नहीं, बल्कि हम सबसे पूछती नज़र आती हैं।


क्या हमने औरतों को रोटी समझ रखा है? वैसे तो दौर 21वीं सदी का है, और महिलाओं ने पुरुषों को हर मामले में कड़ी टक्कर दी है, या यूं कहें कि कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं, पर फिर भी पारुल का वो सवाल मेरे जेहन में इस ब्लॉग को लिखने तक चलता रहा।

आज भी लूटी जा रही अस्मतों से तो यहीं लगता है कि हमने शायद व्यवहारिक तौर पर खुद को मॉडर्न बनाया है, जबकि शायद सोच में हमें काफी बढने की ज़रूरत है।

अगर ऐसा ना होता तो #METoo सरीखे कैंपेन नहीं होते।

यहां इस पूरी कहानी के दौरान ये बात देखने वाली थी कि प्यार किसी का रूहानी तो किसी का महज जिस्मानी था। किसी के प्यार में कशिश तो कहीं सिर्फ हवस थी।


इंसानी रिश्तों के बीच चल रही परेशानियों और हर रिश्ते को निभाने की सबकी अपनी कश्मकश साफ नजर आती है। पारुल का वो एक माँ की मर्ज़ी को निभाने की कशमकश तो वहीं किसी दूसरे की घर चलाने की। किसी की गुलामी तो किसी की भूख मिटाने की कशमकश साफ दिखती है।

इंसानी रिश्तों का तानाबाना सिर्फ एहसासों पर है और इसकी खूबसूरत बानगी हमें तब देखने को मिलती है जब कई दिनों के बाद हिम्मत को देखते ही पारुल उनके गले लग जाती हैं, और इस बात पर हैरान भी कि ये दूसरी औरत कौन हैं।

वैसे इंसानी रिश्तों की एक दूसरी हकीकत है जलन और क्रोध, जिसको कि इस कहानी में काफी अच्छे से दिखाया गया है।

कहानी का बेहद सुंदर चित्रण करने के लिए डायरेक्टर और कैमरामैन को बधाई, लेकिन आखिरकार एक 'गुस्ताख़' दिल प्यार और हवस के बीच एक गुस्ताखी कर गया।



आप भी देखिए इस अद्भुत शार्ट फ़िल्म को:

Sunday, 17 June 2018

सफलता का मापदंड: कंटेंट या कलेक्शन


आजकल फिल्मों का कलेक्शन इस बात का मापदंड है कि आपकी फिल्म हिट है या फ्लॉप। आपने देखा होगा कि बेकार से बेकार फिल्म जैसे कि 'रेस 3' जिसमें ना सर है ना पैर, अगर है तो सिर्फ सलमान खान की शक्तिमान सरीखी मूव्ज और फैंस की बोरियत।

खैर ये मेरी राय है, लेकिन मैंने कुछ ऐसे अतिउत्साही भी देखे जिनके लिए सलमान को गलत कहना मतलब कायनात को गलत कहना है और वो इस बात को मान ही नहीं पा रहे हैं कि फिल्म में कुछ भी कमी हो सकती है, खासकर अगर उसमें सलमान हैं तो।

मैंने ये नहीं कहा कि उनकी हर मूवी खराब होती है, लेकिन अगर आपको ऐसे लोग दिखें जिन्हें न्यूटन और कड़वी हवा में कोई दम ना लगे, लेकिन बूम और ग्रैंड मस्ती अच्छी लगे तो ये सोचना ज़रूरी है कि हम कंटेंट को महत्व देना कब शुरू करेंगे।

ऐसे कई फिल्मों के फैंस हैं जिन्हें ये तक याद नहीं कि आँखों देखीं सरीखी कोई फिल्म भी आई थी, उन्हें तो सिर्फ वो मसाला फिल्में याद हैं जिनमें कुछ अद्भुत कंटेंट कम और बेवजह की चकल्ल्स ज़्यादा दिखती है। मतलब एक हाथ मारने पर गाड़ियों और लोगों का उड़ना उन्हें अच्छा लगता है, लेकिन आँखों देखीं के बाउजी का कहना बुरा।


क्या हो अगर हम इस बात को एक नया मापदंड बनाएं जहाँ कंटेंट अच्छा होने पर आपकी फिल्म हिट मानी जाए ना कि बॉक्स ऑफिस कलेक्शन पर?

शायद यही वजह है कि ऑस्कर विजेता सत्यजीत रे साहब ने बॉलीवुड में महज 2 फिल्में बनाने के बाद बॉलीवुड को अलविदा कह दिया, क्योंकि शायद यहाँ की पैसों से चकाचौंध कर देने वाली दुनिया के झांसे में वो नहीं आना चाहते थे।

अब वक़्त है कि कंटेंट बेस्ड फिल्मों को हिट कहा जाए, क्योंकि गर्म हवा बनाना सबके बस की बात नहीं, और वो किसने बनाई है, शायद ये भी बहुतों को याद नहीं।

Saturday, 16 June 2018

स्मिता पाटिल

स्मिता पाटिल उन चंद अदाकाराओं में से हैं जिन्होंने हमेशा अपने काम से लोगों को प्रभावित किया है। उनकी गमन, मंडी, सूत्रधार सरीखी फिल्में इस बात की मिसाल हैं कि उनके जैसा काम कर पाना हर किसी के बस की बात नहीं है।

आज भी उनकी 'भूमिका' फिल्म में भूमिका काफी सराही जाती है। वो अपने काम के द्वारा सदैव एक नए पर्याय को समाप्त करती थी और एक नए की शुरुआत करती थी। आज जिस सिनेमा को लोग आर्ट सिनेमा, या पैरलेल सिनेमा कहते हैं उसकी नींव उन्होंने अपने समय में रख दी थी।

वो सदा अपने काम से सबको मंत्रमुग्ध कर देती थी। क्या इस मुस्कान के आगे आप अपने गम नहीं भूल जाएंगे?


आज आपको कई अदाकाराएं, कई फैशन शूट्स करती दिखेंगी, लेकिन क्या इस ऐड का कोई मुकाबला है? इसमें सादगी भी है, और क्लास भी, इसमें सैसीपन भी है तो स्टाइल भी।




ये वो अभिनेत्री हैं जिन्होंने एक्टिंग और परफॉरमेंस के नए आयाम खोले, और इन्होने मेन स्ट्रीम सिनेमा में भी काम किया, साथ ही अन्य सिनेमा में भी।

अब एक ऐसी अभिनेत्री जिन्होंने इतना ज़बरदस्त काम किया हो, उनकी एकाएक बच्चे को जन्म देने के दौरान हुई परेशानियों की वजह से 31 साल की अल्पायु में ही मृत्यु हो जाए तो ये कितना दुखद है, ना सिर्फ उनके परिवार के लिए बल्कि सिनेमा जगत के लिए भी।

इस अल्पायु में भी वो हम सबपर एक अमिट छाप छोड़कर चली गई। उनके काम की छाप इतनी बड़ी है कि आनेवाले वक़्त की अभिनेत्रियां ही नहीं, बल्कि अभिनेता भी उनसे सबक ले सकते हैं.

स्मिता पाटिल जी इस बात तो सत्य साबित करती हैं कि 'ज़िन्दगी बड़ी होनी चाहिए, लम्बी नहीं।'

इतने अद्भुत कलाकार, और विशिष्ट मनुष्य को मेरा शत शत नमन।

उनपर बनी एक डॉक्यूमेंट्री आपके साथ साझा कर रहा हूँ, और उनके बारे में उनके समकालीन लोग क्या सोचते हैं, ये सुनिए, तथा आनंद उठाइए: