Thursday, 16 May 2019

'नक्काश' की नक्काशी काफी खूबसूरत है

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'बाबा ये किसका घर है?'
'भगवान का।'
'भगवान् कौन है?'
'अल्लाह मियाँ के भाई।'

जब एक ज़बरदस्त फिल्म का ट्रेलर इन शब्दों से खत्म हो तो आप सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि आखिरकार इस तरह की फिल्मों को बनाए जाने की क्या ज़रूरत आन पड़ी। ये 2019 है, और उस समय भी ऐसी फिल्में, आखिर क्यों?

उसके तुरंत बाद जब आप अपने आसपास नज़र डालते हैं तो ये एहसास होता है कि फिल्में तो समाज का आइना होती हैं। जो आपके आसपास घट रहा है वही तो दिखाया जा रहा है। इक पल को आप ठिठक जाते हैं कि चाँद तक जाने की बातें करने वाले देश और दुनिया में अब भी ऐसी सोच है क्या?

हकीकत वही है जो कुमुद मिश्रा जी ट्रेलर में कहते हैं,'जब बनाने वाले ने फर्क नहीं किया, तो हम कौन होते हैं फर्क करने वाले।' कुछ लोग आज भी इंसान को चमड़ी और ज़ात देखकर ही बात करते हैं और उसपर सबसे ज़बरदस्त कटाक्ष भी पंडित जी ने ही किया,'आप अपनी थाली में आए अन्न को ये देखकर खाते हैं कि उसे हिन्दू ने उगाया है या मुसलमान ने।'



इस ट्रेलर को देखकर मुझे कोई शक नहीं कि ये फिल्म ज़बरदस्त होगी और इसकी कही बात सबके दिलों को छुएगी। मंटो ने पार्टीशन से जुडी अपनी कहानी में कहा भी है,'ये मत कहो कि एक लाख हिन्दू और एक लाख मुसलमान मरे हैं, ये कहो कि दो लाख इंसान मरे हैं।' 2019 में जब हम टचस्क्रीन और हाई-एन्ड सिस्टम्स की बात कर रहे हैं तब भी बटवारे की इस सोच को कुछ लोग कुछ उस तरह से हवा दे रहे हैं जैसे किसी चिंगारी को दी जाती है। ये सोच इंसान को ज़िंदा मार देती है, क्योंकि मुर्दे का शरीर जलता है, ज़िंदा की सोच उसे मार देती है।

ट्रेलर में हर वो चीज़ है जो आपके रोंगटे खड़े कर दे, क्योंकि एक इंसान का काम करना दूसरे को पसंद नहीं, उससे जुडी साजिश, एक का बचाव, और दूसरे का भड़काना, सब ट्रेलर में दिख जाता है। इंसान मौत से नहीं मरता जितना शर्मिंदगी से, और यही वजह है कि इस फिल्म को लेकर मैं उत्साहित हूँ। उम्मीद है जो अब भी लोगों को जाति, वर्ण, कर्म, और धर्म के नाम पर बाटते हैं उन्हें समझ आएगा कि दौर बदल गया है, और जो उनकी सोच को सही मानते हैं उन्हें भी एक करारा जवाब मिलेगा।

कुमुद मिश्रा, इनामुलहक और शारिब हाश्मी जी एक साथ फिल्म 'फिल्मिस्तान' में नज़र आए थे, और उस फिल्म को 'नोटबुक' के डायरेक्टर नितिन कक्कड़ ने डायरेक्ट किया था। अगर आपने वो फिल्म देखी है तो आप इस फिल्म के अंदर होने वाले कमाल को समझ चुके होंगे।

Thursday, 9 May 2019

खोदा पहाड़, निकली चुहिया, वो भी मरी हुई: द ताशकंद फाइल्स



'द ताशकंद फाइल्स' विवेक अग्निहोत्री की फिल्म है और मैं यहाँ पर उस फिल्म का रिव्यू या कुछ और कहने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ। मैं इस फिल्म को सुझाव के कारण देखने गया और अगर ये कहा जाए कि विवेक की फिल्म 'बुड्ढा इन ए ट्रैफिक जाम' के बाद मैं इस फिल्म को देखने के लिए उत्साहित था।

हर डायरेक्टर हमेशा अच्छा नहीं होता और इस फिल्म ने उस बात को साबित किया। इस आर्टिकल में ऊपर बताई गई फिल्म के अलावा शायद ही कोई फिल्म होगी जो आपने इनकी देखी होगी और कइयों ने तो उसे भी नहीं देखा होगा। फिल्म की शुरुआत देखकर मुझे ये अच्छा लगा कि एक टैलेंटेड एक्ट्रेस श्वेता प्रसाद बासु इस फिल्म में अपना हुनर दिखा सकेंगी। मकड़ी और इक़बाल इनके हुनर को बताने के लिए काफी हैं लेकिन जब राइटिंग ही ना हो अच्छी, तो क्या करेगी बच्ची।

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श्वेता के साथ यही हुआ क्योंकि फिल्म की शुरुआत में फेक न्यूज़ को लेकर तंज भरी बातें पाने वाली रागिनी फुले एकदम से ऐसा किरदार करने लग जाती है जो काफी अटपटा सा लगता है। हैरान करने वाली बात है कि जिस इंसान को दुनियाभर के लोग नहीं ढूंढ पाते उसे श्वेता का किरदार ढूंढ लेता है। अगर ये बात हैरान और हँसी नहीं लाती तो आपको आगे बताते हैं।

मिथुन चक्रवर्ती जो इतने मंझे हुए एक्टर हैं, बिहारी एक्सेंट करने की कोशिश करते हैं और किरदार की मट्टी पलीत कर देते हैं। छह को कहने की कोशिश में मिथुन जी ना सिर्फ एक्सेंट को तबाह करते हैं बल्कि किरदार को भी। नसीर साहब ने कोशिश की, पर जब सही से ना लिखी गई हो फिल्म तो एक्टर कबतक और कितना बचाएगा फिल्म और किरदार को खराब दिखने से।

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आप अंदाजा लगाइए कि एक चलते शॉट में जहाँ श्वेता आखिरी बयान दे रही होती हैं, उस समय पल्लवी जोशी जैसी मंझी हुई अभिनेत्री ब्लर में अपनी नाक खुजा रही हैं। एक अच्छा एक्टर क्या इस तरह का काम करता है भला, या ये उनका प्रयास था कि उनपर भी लोगों का शॉट के दौरान ध्यान रहे?

मैं अन्य किसी एक्टर की बात नहीं करूंगा, क्योंकि बाकियों में से सिर्फ एक पंकज त्रिपाठी जी ने मज़ाकिया रहने की कोशिश की, लेकिन वो भी बेवजह की बातों पर। उनसे गुज़ारिश है कि आपसे काफी उम्मीद है हम जैसे लोगों को क्योंकि आप एक्टिंग में धमाल हैं, इस तरह का काम ना करें पंकज जी।


बाकी आपको बताने की ज़रूरत नहीं, कि फिल्म कैसी थी।

Thursday, 2 May 2019

ऑक्टोपस - जानवर या ज़िन्दगी?




ये रंगमंच है जिसमें फ़िल्म से कम समय में और बिना रीटेक के एक कलाकार अपने काम को दिखाता है और आपको हँसाकर, रुलाकर, गुस्सा दिलाकर मंच से परे हो जाता है। उसको मिलने वाली तालियाँ या गालियाँ इस बात की गवाही देती हैं कि उसका काम आपको कितना पसंद आया। ये उसकी वो धरोहर है जो पैसे से ज़्यादा कीमती है। एक फ़िल्म एक्टर तो करोड़ों लेकर ही कुछ करता है, जबकि एक स्टेज एक्टर अभावों के बीच भी दर्शक को एंटरटेन करता है। ये वो नशा है जो अगर लग गया तो किसी और नशे की ज़रूरत नहीं है।

हाल में मुझे भी एक नाटक देखने का मौका मिला और इसका काफी लोगों से ज़िक्र मिलने के बाद इसे देखना ज़रूरी था। नाटक को देखने से पहले का एक नियम है और वो ये कि आप अपना सारा ज्ञान छोड़ दें और सामने वाले के काम को देखें, समझें और सराहें।

इस नाटक की शुरुआत उन बेड़ियों से बंधे लोगों से हुई जो अपनी व्यथा बता रहे थे। उनके लिए ज़िंदगी का मतलब सिर्फ इन बेड़ियों के सहारे चलना है। हालांकि सब ऐसा नहीं सोचते। इनमें से कुछ अपने आसपास के हालात को, लोगों को और ख़ासकर अपनी सोच को दोष देते हैं। मंच पर निर्देशक सूत्रधार है और वो ही सारे किरदारों से आपको रूबरू कराता है, जो ज़िंदगी और हालातों का एक तानाबाना सा है।

हम सब ये सोचकर जीते हैं कि ज़िंदगी वो है जो हम सोचते हैं जबकि असलियत में ज़िन्दगी वो है जो हमें कभी दिखती नहीं। ऑक्टोपस किसी जानवर का नहीं, हमारी अपनी सोच, नज़रिए और अंदाज़ की दास्तान है जिसमें हम सब खुद को कुछ बड़ा और बेहतर समझ चुके हैं लेकिन असलियत में हम सब मज़दूर हैं। हम मज़दूर हैं अपने काम, नाम और ज़िम्मेदारियों के, उन ख्यालों के, उन ज़ज़्बातों के जो हमें एक दूसरे से बांधते हैं।

ये बंधन ही जोड़ता है, तोड़ता है, कचोटता है, रोकता है, और ना जाने किन एहसासों से हमें रूबरू करवाता है। हवस और तृष्णा भी इनमें से उस ऑक्टोपस के रूप है जो किसी के शरीर को चोट पहुँचाकर खुद को मर्द समझते हैं। इस पिछले पॉइंट को ज़्यादा विस्तार से बताने की ज़रूरत नहीं क्योंकि आपकी पैट्रिआर्किअल सोच अबतक उसे समझ चुकी होगी।

ये ऑक्टोपस रंगों में, दंगों में, खान-पान में, रूप-रंग में हर तरह और तरफ दिखता है, लेकिन इसे समझना सबके बस में नहीं। वो जैसा नाटक में भी कहते हैं,'जबसे सृष्टि की रचना हुई इंसान इस तरह से ही चलता आ रहा है, पहले वो अनजान था इसलिए लोगों को मारकर खाता था, अब जानकर अपने फायदे के लिए।' फर्क सिर्फ इतना है कि तब लालच नहीं था, अब ऑक्टोपस के लालच वाले हाथ ने इंसान की भावनाओं का गला घोट दिया है, और इंसान एक मौत जी रहा है, हर दिन, आहिस्ता, आहिस्ता।

पर इस ऑक्टोपस का कोई अंत नहीं है और जिस तरह वहां एक्टर्स एक ट्रैप से निकलर अपनी बात कहकर वापस उस ट्रैप में चले जाते हैं, वैसे ही इंसान भी अपने ट्रैप में जा रहा है, और अब बस देर है उन गुर्राने वाली आवाज़ों की जो दिल को चीर कर और दिमाग को सुन्न कर के रख देंगी।

Friday, 12 April 2019

रिश्ते की दीवार से बनी जिंदगी


वो टीवी पर एक एड आता है, जिसमें एक आवाज़ पीछे से कहती है,'रिश्तों की जमापूंजी।' आज फिर वो आवाज़ कहीं सुनी और एकाएक मैं ख्यालों में चला गया कि कैसे इन रिश्तों को जमापूंजी कह दिया जाता है, क्योंकि किसी भी रिश्ते में पैसे की खनक नहीं होती।

रिश्ते तो इश्क़ जैसे पाकीज़ा होते हैं, पर फिर एक पल को ज़िंदगी के इस सबसे नाज़ुक पर सबसे महत्वपूर्ण जुड़ाव को लेकर सोचना शुरू किया तो पर्दा साफ होता गया। तो आइए इस ख्याल की शुरुआत करते हैं:

रिश्ते जिंदगी की वो ज़रूरत है जिसमें से एक दोस्त को छोड़कर हम नहीं चुन सकते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि आप जिसकी कोख में होते हैं, उसे दुनिया ने सबसे बड़ा और पाकीज़ा ओहदा दिया है, जिसे माँ कहते हैं। उनके पति आपके पिता हो जाते हैं। माँ के माँ-बाप नाना-नानी, तो वहीं पिता के माँ-बाप दादा-दादी।

माँ की बहनें मौसी कहलाती हैं, और चूँकि वो माँ की बहने हैं, तो माँ से कम भी नहीं कहीं जा सकती। एक दौर था जब रिश्तों को उनके असली नाम से बुलाते थे, लेकिन जैसे माँ को आजकल मम कहा जाने लगा है, हो सकता है, आनेवाले समय में बड़ी मौसी को मैक्सिमम और छोटी को मिनीमम कहा जाने लगे।

जिंदगी में रिश्तों की अहमियत कुछ वैसी ही दिखती है जितनी चाय में चीनी और खाने में नमक। दोनों ज़रूरत से ज़्यादा हों या यूँ कहूँ कि उनकी दखलंदाजी ज़रूरत से ज़्यादा हो तो जिंदगी का ज़ायका खराब हो जाता है।

इन सबके बीच एक कमाल की बात ये है कि हमें हमेशा सच बोलने की सीख दी जाती है, लेकिन रिश्तों में हम अक्सर झूठ ही बोलते हैं। अगर किसी से नाराज़गी होती है तो उसके सामने कहने की ताकत रखने की बजाय हम उसकी चुगली करने लग जाते हैं।

वो लोग तो बिना रीढ़ की हड्डी के होते ही हैं, जो किसी की पीठ पीछे बुराई करें, लेकिन उससे भी ज़्यादा नाशुक्रे होते हैं वो जो अपना कीमती वक्त ज़ाया कर ये बकवास सुनते हैं।
रिश्ते कुछ इस कदर हो गए हैं साहब कि जो दीवार कभी घरों के बीच होती थी, आजकल रिश्तों के बीच आ बसी है।

किसी से मत का भेद रखिए, मन का भेद रखना कोई अच्छी बात नहीं, क्योंकि वो एक दिन आपको ही भेद जाती है। इस सबके बीच जो चीज़ रिश्तों में सबसे कमज़ोर है, या इसे कमज़ोर बनाती है, वो है उम्मीदें।

ये बात सच है कि उम्मीद पर दुनिया कायम है, लेकिन उस कहावत में ये नहीं कहा गया कि दूसरों से उम्मीद करने पर दुनिया कायम है। हम सब अपने रिश्तों से उम्मीद लगाते हैं, माँ-बाप बच्चों से उम्मीद लगाते हैं, उनकी पढ़ाई, शादी, और अपने हर फैसले को माने जाने की उम्मीद।

बच्चे माँ-बाप से उम्मीद लगाते हैं, प्रेमिका और प्रेमी तथा पति और पत्नी एक दूसरे से उम्मीद लगाते हैं, लेकिन क्यों? लोगों को रिश्तों को अपनी तरह से निभाने दो, वैसे भी जगजीत सिंह, मरासिम में कह ही चुके हैं,'हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते, वक़्त की साख से लम्हें नहीं तोड़ा करते।'

रिश्तों का मकसद एक दूसरे के साथ रहना था, अपनी उम्मीदों के दबाव से किसी को घोट कर या घुटकर मरना नहीं।

ये रिश्तों की जमापूंजी नहीं, इन्सटॉलमेंट है, जो अपने मरते दम तक हम भरते ही रहते है। मेरी नज़र में तो रिश्तों में प्रेम होना सबसे ज़रूरी है, वरना जैसा रहीम जी कह चुके हैं:
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय,
तोड़े से फिर ना जुड़े, जुड़े गाठ पड़ जाय।

लेखक:अमित शुक्ला

(इस आर्टिकल के किसी भी अंश का इस्तेमाल करने से पहले लिखित अनुमति लेना अनिवार्य है। ऐसा ना करने पर उचित कार्यवाही की जाएगी।)

Monday, 1 April 2019

इस 'नोटबुक' का हर पन्ना रूहानी था

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वो कहते हैं ना, कि कभी कभार कुछ चीज़ें एकदम से होती हैं, और वो सही होती हैं, इस फिल्म के लिए भी कुछ वैसा ही हुआ। इससे पहले कि मैं इस फिल्म के बारे में कुछ कहूँ, उससे पहले आपको बताता चलूँ कि मुझे दरअसल एक दूसरी फिल्म को देखने का न्योता दिया गया था, और मै उस फिल्म को देखने के लिए ही गया था, लेकिन सिनेमा मालिकों के द्वारा ना चलाए जाने की वजह से एक ऐसी फिल्म देखने का मौका मिला, जिसने इस सफर को और खूबसूरत बना दिया। आइए आपको इस प्यारी सी नोटबुक के बारे में बताते हैं जिसमें सिर्फ इश्क़ की खुशबू थी, आहट थी और वो मखमली एहसास था जिसमें रिश्तों को पिरोया गया था।

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किताबों से हम सब की दोस्ती बचपन में ज़रूर हुई होगी, लेकिन शायद ही कभी इश्क़ इतना मुकम्मल और खूबसूरत रहा होगा जितना इस फिल्म में था। दो प्यार करने वालों के बीच जिस तरह से इश्क़ को दिखाया गया वो इतना रूहानी था, कि मैं उसे बयां करने के लिए अल्फ़ाज़ ढूंढने की कोशिश कर रहा हूँ। एक डेब्यू कर रही एक्ट्रेस की तरफ से इतना खूबसूरत काम मैंने एक वक़्त में नहीं देखा है। हर एक लफ्ज़ में वो मासूमियत, और वादियां इस पूरे एहसास को और रूमानी बना दे रहीं थीं।

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इस फिल्म के असली एक्टर थे वो बच्चे जिन्होंने अपनी मासूमियत से पूरी फिल्म में एक अलग ही समा बनाए रखा। अगर प्रनुतन बहल (आशा है उनका नाम सही लिखा गया है) के काम को देखें तो मुझे उनके काम में वो हुनर दिखा जिसको पाने में बड़े एक्टर्स को भी समय लगता है। इस पूरी फिल्म में इश्क़ रूहानी था, जिसको हर पल महसूस किया जा सकता था। अपने प्यार की याद में इंतज़ार करते उस आशिक की ख़ुशी को महसूस किया जा सकता है, जो दिल से होती हुई, रूह में बस जाती है। इस किस्म की फिल्में ये भी दर्शाती हैं कि आपको इश्क़ को दिखाने के लिए ऊलजलूल करने की ज़रूरत नहीं है।

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एक बात जो इस फिल्म के दौरान और बाद में भी मेरे ज़ेहन में रही, वो ये कि फिल्म जगजीत सिंह की उस ग़ज़ल की तरह है जिसमें वो खुशबू है, जिसे हर कोई पसंद करता है। उनकी एक ग़ज़ल मुझे ये लिखते हुए याद आ रही है, जो आपके नज़र करता हूँ:


इस ग़ज़ल में जो खुशबू है वो इतनी खूबसूरत है कि उसका मुकाबला, आजकल के रैप के बोल ,'रात के बज गए पौने दो, प्यार मोहब्बत होने दो' जैसे गीत नहीं कर सकते। इस फिल्म को मैं अपने इन अल्फ़ाज़ों से बयां करूंगा,

'इश्क़ अगर मुकम्मल होता तो इश्क़ क्यों होता, 
है कशिश ऐसी, हर ज़र्रा आहट पर मुस्काया है,
वो बेनज़ीर बनकर मुझमें है कुछ इस कदर,
कि वो ही मेरा गुरूर, मेरा सरमाया है।' - शुक्ल

Monday, 26 November 2018

दीवार उठाइए, नज़रिया बढ़ाइए


दीवार ज़िन्दगी की एक बेहद ज़रूरी ज़रूरत है। आज आप या हम जिस घर में रहते हैं उसकी सबसे पहली चीज़ ये दीवार ही तो है। वो घरौंदा जिसे हर कोई अपना आशियाना कहता है, उसकी पहली चीज़ एक दीवार है।

दीवार वैसे तो हमें सिर्फ अपने घरों में दिखती है, लेकिन अगर थोड़ा गौर करें तो हमें ये समझने में देर नहीं लगेगी कि ये दीवार तो सिर्फ एक जरिया है कुछ बड़ी चीज को बताने का। क्या आप उसे समझ सके? शायद हाँ, शायद ना। अगर आप समझ गए हैं तो फिर ये ब्लॉग पढ़ना बेमानी है, लेकिन अगर नहीं तो इसे ज़रूर पढ़िए।

एक दीवार वो है जो हमारे घरों की हिफाज़त के लिए बनाई जाती है, जिसके ज़र्रे ज़र्रे पर ये लिखा होता है कि ये फला साहब या साहिबा के नाम पर है। इसमें कोई भी नहीं जा सकता। ये तो वो जगह है जहां कोई भी बिना आपकी मर्जी के नहीं जा सकता, लेकिन उस दीवार का क्या जो आपके ज़ेहन में है?

जी हाँ, हमारे दिमाग में भी एक दीवार है। वो दीवार चाहे आपकी परवरिश की हो, या फिर सोच की, नज़रिए की या किसी और चीज़ की, हर तरफ एक दीवार ही है। पढ़ाई एक बेहद कमाल चीज़ है, क्योंकि वो इन दीवारों को तोड़ती है, लेकिन हम भी कमाल हैं।

हमें आदत है कुछ नए तो तोड़कर नया बनाने की, और इसी लिए जब हम पढ़ते हैं तो एक नई सोच बना लेते हैं। वो सोच जो या तो कुछ पढ़कर या देखकर आती है। उस पढ़ने की वजह से हमने एक पुरानी सोच को गिरा दिया लेकिन एक नई सोच बना ली। अब हम उसकी दीवार में कैद हो गए हैं।

इस कैद से बचने का इकलौता तरीका है कोई भी दीवार ना बनाना, लेकिन ये लिखने में जितना आसान है, करने में उतना ही मुश्किल। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि हम सब पैदा होते हैं एक खाली स्लेट की तरह, लेकिन वक़्त के साथ इसमें हमारे बड़ों ने अपने तरीके से अक्षर लिख दिए। किसी ने कहा कि फला चीज़ ठीक है, फला नहीं, ये सात्विक है ये तामसिक। वो सुकर्म है, और दूसरा कुकर्म।

बस फिर क्या था, आप भी उसी को विश्वास कर आगे बढ़ते रहे और एक नई दीवार बना बैठे, जो बदलते समय के साथ भले ही तथाकथित मॉडर्न तो हुई लेकिन साथ ही अवसरवादी हो गई। एक नई दीवार बन गई जिसमें पुराने की महक रही क्योंकि हमने ना उसे छोड़ा ना ही पूरी तरह से अपनाया।

ज़रूरी है कि बाज़ारू चश्में उतारकर एक बार खुद के दिमाग को भी टटोलने की कोशिश की जाए कि क्या हम आगे बढ़ रहे हैं या फिर सोच की इस दीवार ने हमें सिर्फ एक नया आवरण दे दिया है जिसमें हमने खुद के लिए एक 'मॉडर्न' दीवार बना ली है जहां उपभोगता भी हम हैं और प्रचारक भी।

ये ज़रूरी है कि हम इन दीवारों को हटाएं, ना कि नई दीवारें बनाएं।

लेखक:
अमित शुक्ला

Saturday, 7 July 2018

5 रीजनल फिल्में जो बॉलीवुड को नहीं बनानी चाहिए

बॉलीवुड में एक समय सिर्फ गाने ही चोरी हुआ करते थे, लेकिन फिर इन्हें इंस्पायर्ड कहा जाने लगा। ये एक तरह से किसी पुरानी चीज़ को नए पैकेट में पेश करने का नया नाम था।

सिर्फ गाने ही नहीं, बॉलीवुड में फिल्में भी चोरी या इंस्पायर्ड होती है। यहां मैं ये कहना चाहूँगा की बॉलीवुड ने एक फ़िल्म रीमेक की है जिसका इंतज़ार फैंस को बेसब्री से रहेगा।

अब चूंकि मराठी फ़िल्म सैराट, धड़क के रूप में हमारे बीच जल्द आने वाली है। उसके गानों और फ़िल्म का ट्रेलर देखकर मैं यही कहूंगा कि बॉलीवुड को कभी भी रीजनल क्लासिक को नहीं खराब करना चाहिए। तो इस बात को ध्यान में रखकर, मैंने ये सोचा कि क्यों ना उन 5 रीजनल फिल्मों के बारे में बात की जाए जिन्हें बॉलीवुड को नहीं बनाना चाहिए:

5 फैनड्री (मराठी)




ये फ़िल्म भी नागराज मंजुले की ही है और सैराट की तरह ही इसमें भी एक अलग जाति, बड़े-छोटे के स्तर को दिखाया गया है। एक तरफ जहां सैराट कॉलेज पर आधारित है तो फैनड्री स्कूल पर।

इस फ़िल्म में भी नागराज ने एक बेहद बड़ा सवाल उठाया है पर अगर इसे बॉलीवुड में दिखाया गया तो ये मेलोड्रामा हो जाएगा।

इसलिए बॉलीवुड इस फ़िल्म को ना बनाए।

4 कोर्ट (मराठी)





ये एक ऐसी कहानी है जिसे देखने भर से ही आपको समझ आ जाता है आखिरकार क्यों मराठी सिनेमा बॉलीवुड से आगे चल रहा है।

ना कोई एक्शन, ना बेवजह की चीज़ें, बस एक साधारण कहानी पर उसके बाद भी आप इस फ़िल्म से नज़रें नहीं हटा पाएंगे और अगर आप इस फ़िल्म में कोर्ट की कहानियाँ, उससे जुड़े सवाल और उसकी प्रक्रिया को समझ सकेंगे तो आप भी इस फ़िल्म के मुरीद हो जाएंगे।

3 पंजाब 1984 (पंजाबी)




1984 के दौरान पंजाब में भड़के दंगों और उस दौरान हुए नरसंहार के साथ साथ किस तरह बच्चों, बड़ों, बुजुर्गों और औरतों के साथ दुर्व्यवहार हुआ, इसको दर्शाती है ये फ़िल्म।

इसके साथ साथ इस फ़िल्म में ये भी दिखाया है कि किस तरह उस समय लोग गलत रास्तों पर निकल पड़े थे। दिलजीत दोसांझ और सोनम बाजवा की इस फ़िल्म में किरन खेर की एक अहम भूमिका है।

अगर बॉलीवुड इसे बनाएगा तो मेलोड्रामा बना देगा इसलिए अगर वो इस फ़िल्म को नहीं बनाए तो ये ना सिर्फ इस फ़िल्म बल्कि लोगों पर बड़ी मेहरबानी होगी।

2 विसरनै (तमिल)



ये फ़िल्म भारत की तरफ से ऑस्कर्स में जाने वाली फिल्म थी। अब इसके बाद क्या कुछ कहना बाकी है?

ये तमिल में बनने वाली ऐसी फिल्म है जिसको देखने के बाद आपके रोंगटे कांपने लग जाएंगे। लॉकअप नाम की किताब पर बनी ये फ़िल्म एक सच्ची घटना पर आधारित है जिसमें 4 में से जिंदा बच गए एक लड़के ने अपनी आप बीती बताई है और ये भी कि इन सबकी ज़िन्दगी में क्या गुज़रा।

इसे अगर बॉलीवुड ने बनाया तो ज़बरदस्ती का म्यूजिक डालकर लोगों को भावुक किया जाएगा, लेकिन इस तमिल फ़िल्म में उसकी जरूरत नहीं है, अभिनय ही काफी है।

1 पाथेर पांचाली (बंगाली)



सत्यजीत रे की इस फ़िल्म के बारे में कुछ कह सकूं अभी या कभी भी मैं इस योग्य नहीं हो पाऊंगा।

ये वो फ़िल्म है जिसे देखने के लिए विदेशी तक आज भी लालायित हैं।

प्रिय बॉलीवुड तुम इसे मत बनाना वरना तुम गुड़ का गुड़ गोबर करने में समय नहीं लगाओगे।

Thursday, 5 July 2018

बम्बई और फूड: कमाल का कॉम्बिनेशन

खाना हम सबको जोड़ता है, और इसकी एक मिसाल है हमारा अद्भुत कल्चर जो हर कुछ किलोमीटर पर बदलता है और आज मैं कुछ बेहद प्रसिद्ध मुम्बईया खाने के बारे में चित्रों के माध्यम से बताने वाला हूँ।

ये आर्टिकल सिर्फ इसलिए है क्योंकि मुझे मुम्बई और खाने दोनों से प्यार है। तो अगर आप मुम्बई में हैं तो इन जगहों पर ज़रूर जाइए:











Saturday, 30 June 2018

4 शब्द जिनको लखनऊ में बोलने का अपना ही मज़ा है


अगर आप लख़नऊ के रहने वाले हैं या कभी यहाँ आए हैं तो आपको ये मालूम होगा कि इस शहर की आबो हवा में एक अलग ही मज़ा है। वो चौक की गलियाँ, और वो सुबह सुबह दही जलेबी का मज़ा। वो सुबह उगते सूरज को गोमती या मरीन ड्राइव से देखना और वो गंज की अपनी खुशबू।

जी हाँ, ये सोचकर ही कितना अच्छा लग रहा है इसका अंदाजा मैं लगा सकता हूँ, और अगर आप वाकई में यहाँ कुछ वक़्त दे चुके हैं तो यहाँ के मज़े को कभी नहीं भूल सकेंगे। लख़नऊ आपके अंदर कुछ इस तरह बस जाता है, जैसे आपकी पहली गर्लफ्रेंड से जुडी यादें।

जितनी खूबसूरत यहाँ की आबो हवा और उसके पकवान है, उतने ही प्यारे यहाँ के मोनुमेंट्स हैं। पर आप ये कह सकते हैं कि मोनुमेंट्स तो हर शहर में होते हैं, और मैं इस बात से इंकार नहीं कर सकता, लेकिन हिंदी ही नहीं, व्याकरण में भी कुछ ऐसे शब्द हैं जो आपको सिर्फ लख़नऊ में ही सुनने को मिलेंगे, और मैं यहाँ आपके नज़र उन्हें करता हूँ:

4 भौकाल



अगर आप लख़नऊ में हैं और आपने ये शब्द नहीं सुना तो आपका लखनऊ में होना बेकार हो गया। ये एक ऐसा शब्द है जिसका इस्तेमाल आपको हर बंदा करता हुआ दिखेगा। इस शब्द के बिना लखनऊ वाले का वाक्य ही पूरा नहीं होता तो फिर आप इसे ना सुने ऐसा नहीं हो सकता।

3 तफरी


दिल्ली वाले चाहे जितना अपने टाइमपास और मुंबई वाले अपनी फालतुगिरी पर नाज़ करें, जो मज़ा तफरी कहने में है वैसा कोई दूसरा नहीं। ये एक ऐसा शब्द है जिसको सुनते ही लगता है जैसे कोई बड़ा काम काम हो रहा है ना कि 'टाइमपास'।

2 कंटाप

आप चाहे कितने भी चांटें लगाने या कान के नीचे बजाने की बात करें, जो सौंदर्य कंटाप शब्द सुनने में है वैसा दूसरा कहीं नहीं। जी हाँ, सोचिए आपको कोई परेशान कर रहा हो और आप उससे कहें कि हम चांटा मार देंगे?

कितना नीरस सा नहीं लगता? वहीँ ये सोचिए,'तुमने ज़्यादा तफरी की तो हम कंटाप धर देंगे' में कितना आनंद आ रहा है।

1 छीछालेदर


जब लाइफ की लगी हो वात तो भला कैसे करेंगे आप ठाठ, लेकिन इतना बड़ा वाक्य बोलने की क्या ज़रूरत है जब आप सिर्फ एक शब्द में कह सकते हैं वो सारी बात, और वो शब्द है,'छीछालेदर'।

एक शब्द और आपकी पूरी कहानी सामने वाले को समझ में आ जाती है। 

तो फिर अपना और सामने वाले का समय बचाइए, और मुस्कुराइए, क्योंकि आप लखनऊ में हैं।

Friday, 29 June 2018

5 कारण जिसकी वजह से आपको संजू फिल्म देखनी चाहिए

`Read this blog in English at: http://themstudio.blogspot.com/2018/06/5-reasons-why-sanju-is-must-watch-for.html


संजू फिल्म आज सबके बीच आ ही गई। अब आप इस फिल्म को पसंद करें या नापसंद, लेकिन इस बात में कोई दोराय नहीं है कि संजय दत्त की कहानी को दिखाने के प्रयास में राजकुमार हिरानी ने काफी मेहनत की है।

संजू असल में संजय दत्त की ज़िंदगी पर आधारित है जिसने काफी बड़े पहलुओं को बेहद सजीव तरिके से दिखाया है। अगर आप संजू को नापसंद करते हैं तो आपको लगेगा कि इस फिल्म से संजय दत्त ने खुद को साफ़ बताने की कोशिश की है, जबकि अगर आप संजू के फैन हैं तो आपको इसका बिल्कुल उलट लग सकता है।

ये सोचना ज़रूरी है कि आखिरकार एक इतने बड़े परिवार का लड़का, एक इतनी मुश्किल ज़िन्दगी में कैसे पड़ गया। ये तो आप विवेचना करें, लेकिन हम आपको बताते हैं उन5 कारणों के बारे में जिसकी वजह से आपको ये फिल्म देखनी चाहिए: 

5 कहानी


संजय दत्त की कहानी ऐसी है कि उसे समझने में काफी वक़्त लगेगा। एक लड़का जो इतने बड़े परिवार में जन्मा, एक अदाकार रहा, वो आखिरकार इस तरह की परेशानियों में कैसे पड़ गया।

उनकी ज़िन्दगी काफी कश्मकश में गुज़री लेकिन उसके बावजूद उन्होंने इसे बेहद सलीके से गुज़ारा और उसे अब परदे पर भी बताना चाहा। ये बात देखकर अच्छा लगा कि कोई व्यक्तिगत चीज़ों को भी पूरी शिद्द्त से बताना चाहता था।

अगर आप वाकई में कोई अच्छी कहानी देखना चाहते हैं तो इस फिल्म को ज़रूर देखें।

4 एक्टिंग


रनबीर कपूर ने संजय दत्त को पर्दे पर दिखाने के लिए जिस तरह की मेहनत की वो साफ़ दिखाई देती है। संजय दत्त का बोलने का अंदाज़ हो या फिर चलने का, रनबीर कपूर ने पूरी कोशिश की है कि वो दत्त जैसे दिखें, बोलें, और काफी हद तक वो उसमें सफल भी रहें हैं।

उनका जेल के दिनों को बखूबी दिखाना इस बात को साबित करता है कि वो एक माहिर एक्टर हैं जिन्होंने उतना ही दिखाया जितना या तो स्क्रिप्ट या डायरेक्टर की डिमांड थी।

3 कास्ट


अब जैसे क्रिकेट में होता है कि स्ट्राइकर सिर्फ तभी अच्छे से खेल सकता है जब दूसरे छोर पर कोई उनका साथ निभाता रहे और इस फिल्म में वो काम सपोर्टिंग कास्ट ने किया है। परेश रावल जी ने दत्त साहब का किरदार बखूबी निभाया तो वहीँ मनीषा कोइराला ने नरगिस जी का किरदार। दीया मिर्ज़ा मान्यता दत्त के तौर पर काफी प्रभावशाली थीं, और जिम सरभ उनके मित्र मिस्त्री के किरदार के रूप में प्रभावशाली थे।

इन सबके बीच विकी कौशल ने अपने एक्टिंग के कौशल का लोहा हर सीन में मनवाया है। उनके आने से फिल्म में एक नई जान आ गई और फिल्म बेहद अच्छी लगी।

2 एग्ज़िक्यूशन


जब ज़िन्दगी इतनी बड़ी हो तो ये देखना ज़रूरी होता है कि हम भला किस चीज़ को दिखाएं और किसे रहने दें। इस चीज़ में इस फिल्म के डायरेक्टर, राइटर और कैमरामैन ने महारत हासिल कर रखी थी।

उन्होंने सिर्फ उन्हीं पलों को दिखाया जो ज़रूरी थे, और उन चीज़ों को हटा दिया जिनकी ज़रुरत या तो नहीं थी या जिसकी वजह से फिल्म एकदम मेलोड्रामा लगे। हालांकि ये कहना कि इस दौरान आपकी आँखें नम ना हों ऐसा मुमकिन नहीं है।

1 डायरेक्शन


जब ज़िन्दगी इतनी बड़ी हो तो उसे सही से सिर्फ एक ऐसा डायरेक्टर ही दिखा सकता है जिसे इसमें महारत हासिल हो, और हिरानी साहब में वो हुनर है कि वो इस चीज़ को दिखा सकें।

उन्होंने जिस तरह से संजू की कहानी को अभिजात जोशी के साथ पन्नों के साथ साथ स्क्रीन पर उतारा है वो काबिल-ए-तारीफ है।

अगर आप अच्छा सिनेमा देखना चाहते हैं तो इस फिल्म को ज़रूर देखें।

लेखक: अमित शुक्ला