Sunday, 17 June 2018

सफलता का मापदंड: कंटेंट या कलेक्शन


आजकल फिल्मों का कलेक्शन इस बात का मापदंड है कि आपकी फिल्म हिट है या फ्लॉप। आपने देखा होगा कि बेकार से बेकार फिल्म जैसे कि 'रेस 3' जिसमें ना सर है ना पैर, अगर है तो सिर्फ सलमान खान की शक्तिमान सरीखी मूव्ज और फैंस की बोरियत।

खैर ये मेरी राय है, लेकिन मैंने कुछ ऐसे अतिउत्साही भी देखे जिनके लिए सलमान को गलत कहना मतलब कायनात को गलत कहना है और वो इस बात को मान ही नहीं पा रहे हैं कि फिल्म में कुछ भी कमी हो सकती है, खासकर अगर उसमें सलमान हैं तो।

मैंने ये नहीं कहा कि उनकी हर मूवी खराब होती है, लेकिन अगर आपको ऐसे लोग दिखें जिन्हें न्यूटन और कड़वी हवा में कोई दम ना लगे, लेकिन बूम और ग्रैंड मस्ती अच्छी लगे तो ये सोचना ज़रूरी है कि हम कंटेंट को महत्व देना कब शुरू करेंगे।

ऐसे कई फिल्मों के फैंस हैं जिन्हें ये तक याद नहीं कि आँखों देखीं सरीखी कोई फिल्म भी आई थी, उन्हें तो सिर्फ वो मसाला फिल्में याद हैं जिनमें कुछ अद्भुत कंटेंट कम और बेवजह की चकल्ल्स ज़्यादा दिखती है। मतलब एक हाथ मारने पर गाड़ियों और लोगों का उड़ना उन्हें अच्छा लगता है, लेकिन आँखों देखीं के बाउजी का कहना बुरा।


क्या हो अगर हम इस बात को एक नया मापदंड बनाएं जहाँ कंटेंट अच्छा होने पर आपकी फिल्म हिट मानी जाए ना कि बॉक्स ऑफिस कलेक्शन पर?

शायद यही वजह है कि ऑस्कर विजेता सत्यजीत रे साहब ने बॉलीवुड में महज 2 फिल्में बनाने के बाद बॉलीवुड को अलविदा कह दिया, क्योंकि शायद यहाँ की पैसों से चकाचौंध कर देने वाली दुनिया के झांसे में वो नहीं आना चाहते थे।

अब वक़्त है कि कंटेंट बेस्ड फिल्मों को हिट कहा जाए, क्योंकि गर्म हवा बनाना सबके बस की बात नहीं, और वो किसने बनाई है, शायद ये भी बहुतों को याद नहीं।

Saturday, 16 June 2018

स्मिता पाटिल

स्मिता पाटिल उन चंद अदाकाराओं में से हैं जिन्होंने हमेशा अपने काम से लोगों को प्रभावित किया है। उनकी गमन, मंडी, सूत्रधार सरीखी फिल्में इस बात की मिसाल हैं कि उनके जैसा काम कर पाना हर किसी के बस की बात नहीं है।

आज भी उनकी 'भूमिका' फिल्म में भूमिका काफी सराही जाती है। वो अपने काम के द्वारा सदैव एक नए पर्याय को समाप्त करती थी और एक नए की शुरुआत करती थी। आज जिस सिनेमा को लोग आर्ट सिनेमा, या पैरलेल सिनेमा कहते हैं उसकी नींव उन्होंने अपने समय में रख दी थी।

वो सदा अपने काम से सबको मंत्रमुग्ध कर देती थी। क्या इस मुस्कान के आगे आप अपने गम नहीं भूल जाएंगे?


आज आपको कई अदाकाराएं, कई फैशन शूट्स करती दिखेंगी, लेकिन क्या इस ऐड का कोई मुकाबला है? इसमें सादगी भी है, और क्लास भी, इसमें सैसीपन भी है तो स्टाइल भी।




ये वो अभिनेत्री हैं जिन्होंने एक्टिंग और परफॉरमेंस के नए आयाम खोले, और इन्होने मेन स्ट्रीम सिनेमा में भी काम किया, साथ ही अन्य सिनेमा में भी।

अब एक ऐसी अभिनेत्री जिन्होंने इतना ज़बरदस्त काम किया हो, उनकी एकाएक बच्चे को जन्म देने के दौरान हुई परेशानियों की वजह से 31 साल की अल्पायु में ही मृत्यु हो जाए तो ये कितना दुखद है, ना सिर्फ उनके परिवार के लिए बल्कि सिनेमा जगत के लिए भी।

इस अल्पायु में भी वो हम सबपर एक अमिट छाप छोड़कर चली गई। उनके काम की छाप इतनी बड़ी है कि आनेवाले वक़्त की अभिनेत्रियां ही नहीं, बल्कि अभिनेता भी उनसे सबक ले सकते हैं.

स्मिता पाटिल जी इस बात तो सत्य साबित करती हैं कि 'ज़िन्दगी बड़ी होनी चाहिए, लम्बी नहीं।'

इतने अद्भुत कलाकार, और विशिष्ट मनुष्य को मेरा शत शत नमन।

उनपर बनी एक डॉक्यूमेंट्री आपके साथ साझा कर रहा हूँ, और उनके बारे में उनके समकालीन लोग क्या सोचते हैं, ये सुनिए, तथा आनंद उठाइए:

Friday, 15 June 2018

अमजद खान साहब के साथ एक गुफ्तगू



अमजद खान साहब अपने दौर के सबसे वर्सेटाइल एक्टर्स में से एक रहे हैं। उन्होंने ना सिर्फ गब्बर सिंह सरीखे विलन का किरदार किया बल्कि कई अन्य फिल्मों में कुछ बेहद चुटीले किरदार भी किए, जिनमें चमेली की शादी शामिल है।

वो एक ऐसे अभिनेता हैं जो अपने काम से लोगों को हमेशा हतप्रभ कर देते थे, और ये उनके काम की विशेषता ही कही जाएगी कि आज भी उनकी फिल्में देखने के बाद कोई इस बात की कल्पना नहीं कर सकता कि उनके किए किरदार कोई और इतनी खूबी से कर सकेगा।

आप और हम उन्हें गब्बर सिंह के तौर पर बेहद पसंद करते हैं लेकिन बेहद कम लोग ये जानते हैं कि वो कभी फिल्मों में नहीं आना चाहते थे। उन्हें रंगमंच से काफी प्यार था पर जावेद अख्तर साहब और सलीम साहब के कहने पर उन्होंने शोले के लिए ऑडिशन किया, और बाकी इतिहास है।

इस इंटरव्यू में आपको वो कई चीज़ों पर बात करते नज़र आएंगे, जिनमें फिल्में, राजनीति, सेंसरशिप और उनका बढ़ा वजन शामिल हैं।

इस महान अदाकार के इस अद्भुत इंटरव्यू का आनंद उठाइए:



Thursday, 7 June 2018

3 कारण जो ये बताते हैं कि 'वीरे दी वेडिंग' एक धाकड़ फिल्म है

If you wish to read this article in English, Visit: http://themstudio.blogspot.com/2018/06/3-reasons-why-veere-di-wedding-is.html

'वीरे दी वेडिंग' का नाम ज़ेहन में आते ही ऐसा लगता है कि ये एक लड़कों वाली फिल्म है जिसमें आपको लड़कों की दबंगई या मस्ती दिखेगी लेकिन जैसे ही आपको ये पता चलता है कि ये एक लड़कियों से लबरेज़ फिल्म है तो आप सोचने लगते हैं कि शायद इसमें हमें सूरज बड़जात्या का लुक मिलेगा, पर ऐसा नहीं  है।

ये असल में दोस्तों की कहानी है जो अपनी ज़िन्दगी के एक नए आयाम को देखने की कोशिश करते हैं। आइए आपको बताते हैं कि आखिरकार ये फिल्म धाकड़ क्यों है:

3 स्त्री की बातों को सबके सामने लाता है


अमूमन हमें ऐसा लगता है कि मास्टरबेशन सिर्फ लड़कों की आदत है, लेकिन इस फिल्म में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि ये किसी के साथ भी हो सकता है और ये एकदम नैचुरल है।

इस फिल्म के एक दृश्य में स्वरा भास्कर स्वयं को आनंद प्रदान करने के लिए वाइब्रेटर से खुद को आनंदित कर रही होती हैं जब उनके ऑर्थोडोक्स पति (सूरज सिंह) इस बात को लेकर उन्हें ब्लैकमेल करते हैं।

हमें अपने बच्चों से बात करनी चाहिए और बच्चों को भी खुलकर बात रखनी चाहिए, जैसा कि स्वरा अंत में करती है, और उसकी वजह से उनके सर पर से बोझ खत्म हो जाता है।

स्वरा की माँ इरा भास्कर ने अपनी बेटी के इस सीन को लेकर जो प्रतिक्रिया दी, उसके बाद ये लगता है कि हर माँ को अपने बच्चे को सही बोलने से ना हिचकने को कहना चाहिए।

बकौल इरा: 'मुझे यह कहकर शुरू करना चाहिए कि भारतीय सिनेमा में कामुकता एक विषय नहीं है जिसे सीधे व्यक्त किया गया है।'

आप इस बात को इस लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं: http://www.dnaindia.com/bollywood/report-veere-di-wedding-this-is-what-swara-bhasker-s-mother-has-to-say-about-her-masturbation-scene-2622603

2 हीरो की 'नो एंट्री'


अगर आपको क्वीन मूवी याद हो तो उस मूवी ने इस बात का ट्रेंड शुरू किया कि एक फिल्म को कामयाब बनाने के लिए आपको किसी माचो मैन बिल्डअप वाले हीरो की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि अगर आपकी फिल्म का कंटेंट अच्छा होगा तो निर्मल बने इश्वाक सिंह और स्वरा के पति बने सूरज सिंह भी धमाल कर सकते हैं, भले ही उनका किरदार बेहद छोटा हो।

आपको वो एक स्कूटी की टैगलाइन याद है,'Why should boys have all the fun?'

वो इस फिल्म पर एकदम फिट बैठती है।

1 नई डायरेक्टर, नई संभावनाएं


अपनी पहली ही फिल्म से रिया कपूर ने एक सही शुरुआत की है। शादियों में होने वाले फ़िज़ूल खर्च और आपकी सारी कामयाबियों को शादी के सामने धूमिल बताने वाले डायलॉग्स सोसाइटी की सोच पर एकदम सही चोट करते हैं।

लेखक: अमित शुक्ला

Wednesday, 30 May 2018

4 कारण जो ये बताते हैं कि संजू फिल्म का ट्रेलर सफलता की गारंटी है

If you aren't comfortable in Hindi, visit: http://themstudio.blogspot.com/2018/05/4-reasons-why-sanju-trailer-means.html

आखिरकार वो आ गया।



संजू मूवी का ट्रेलर आखिरकार आ गया और इसके साथ शुरू हुई पिक्चर रिलीज़ की उलटी गिनती जिसको देखने के लिए लोग उत्साहित हैं, और साथ ही बुकिंग वेबसाइट द्वारा प्री-बुकिंग भी।

अगर टीज़र और ट्रेलर की बात करें तो उसने किसी भी तरह से निराश नहीं किया, पर जितनी खूबसूरती से उन्होंने एक उतार चढ़ाव से भरी ज़िन्दगी का विवरण महज 3 मिनट में किया है वो काबिल-ए-तारीफ है।

इस फिल्म के टीज़र में एक लाइन थी जिसको सुनने और ट्रेलर को देखने के बाद इस बात में कोई दोराय नहीं कि हम कुछ धमाल देखने वाले हैं और ये हैं उसके 4 प्रमुख कारण:

4 अद्भुत कास्ट


जब ज़िन्दगी इतनी बड़ी है तो उसको दर्शाने वाले किरदार भी बड़े ही होंगे और इसमें कोई दोराय नहीं है कि इसके लिए चुने गए एक्टर्स कमाल हैं, फिर चाहे पिता के रोल में परेश रावल हों या फिर मित्र के रूप में विकी कौशल। जिम सराभ और बोमन ईरानी को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है।

3 एक अद्भुत जीवन


जब आप एक बड़े घर से आते हों, और आपके माता पिता का नाम हो, उसके बाद आप ड्रग एडिक्ट बन जाएं, और सबसे बड़ी बात कि आप देशद्रोह के लिए बुक किए जाएं, जिनमें 1993 के मुंबई बम धमाके शामिल हों तो आपको मानसिक क्षति होना लाज़मी है।

एक आम इंसान की एक असाधारण ज़िन्दगी को पर्दे पर देखना एक अलग ही अनुभव होगा।

2 राजकुमार हिरानी का निर्देशन


राजकुमार हिरानी का निर्देशन हमेशा ही कमाल रहा है और ये आप उनकी पुरानी फिल्में: पीके, 3 इडियट्स से जान सकते हैं।

उनका सक्सेस रेट 100 प्रतिशत का है और उनकी कहानी बताने की कला इतनी ज़बरदस्त है जिसका जवाब नहीं। इसलिए इस बात को लेकर आश्वस्त हो जाइए कि आप एक अद्भुत फिल्म देखने वाले हैं।

1 रनबीर कपूर की ज़बरदस्त अदाकारी


सावरिया से शुरुआत करने वाले रनबीर कपूर ने वक़्त के साथ अपने काम करने के तरीके को बेहतर किया है, और इसकी बानगी है बर्फी, राजनीति सरीखी फिल्में।

संजू के साथ वो एक अलग ही धमाल करने वाले हैं, और इसलिए आप 29 जून को एक ज़बरदस्त फिल्म के लिए तैयार रहिए।

Saturday, 28 April 2018

बम्बई की लखनवी पाव भाजी

अगर आप कभी हज़रतगंज जाकर सप्रू मार्ग की तरफ जाएंगे तो कैथेड्रल के पीछे आपको ये स्टाल गाँधी खादी ग्रामउद्योग के साथ दिख जाएगा।


100 रुपए पर प्लेट की ये पाव-भाजी अच्छी है, और उसमें स्वाद भी है, पर इस अद्भुत डिश को नार्थ इंडियन बनाने के लिए इसमें ज़बरदस्त मक्खन डाल दिया गया। मुझे व्यक्तिगत तौर पर ये लगा कि अगर इनकी डिश में मक्खन और दाम में रुपए कम हों तो इसको हर कोई खाना चाहेगा।

वैसे इसको खाने का प्लान बनवाने के लिए मैं अपने साथियों को धन्यवाद देना चाहूंगा। एक अच्छा अनुभव था, एक अच्छा लंच ऑप्शन।

आला अफसर

पिछले शुक्रवार को मैं जब बुक फेयर गया तो वहीँ पता चला कि एक नाटक भी हो रहा है जिसका नाम था आला अफसर। अब इस नाटक को पहले कभी देखा नहीं था और नाटक देखने और करने की ऐसी लत लगी हुई है कि रहा ना गया।

मैंने ऑडिटोरियम में एंट्री की तो बस अभी शुरुआत ही हुई थी। इसको देख मुझे हमारे नाटक, मुंशी प्रेमचंद के 'मोटेराम का सत्याग्रह' की याद आ गई।

नाटक की रूपरेखा बिलकुल समान थी जहाँ एक अफसर के आने की बात सुनकर सभी हैरान थे, और उसे रिझाने के तरीकों पर विचार कर रहे थे।

उसके बाद पता चला की खुद चेयरमैन साहब उस अफसर को लेने और आवभगत करने पहुंचे। उसके बाद शुरू हुआ उस अफसर का रौब, उसके किस्से, उसके अंतरंग प्रेम की कहानियां।

अब चूँकि ये सबकुछ लखनऊ में था तो संगीत भी था, और वो भी लाइव। मतलब हारमोनियम, ढोलक वाले स्टेज के अपर साइड पर किनारे बैठे हुए थे और उसको बजा रहे थे।


नाटक को कॉमिकल रखा गया था, और उसमें हल्की फुलकी सटायर की झलक थी। ज़्यादातर गीतों में गैंग्स ऑफ़ वासेपुर के इस गीत की झलक थी।


नाटक के अंत में पता चलता है कि वो एक नकली अफसर था और सबको चूना लगाकर चला गया। असली अफसर बाद में आनेवाला है।

नाटक में मुख्या अफसर का किरदार प्रमुख था और सबसे ज़्यादा स्टेज पर वही था। एक अच्छा शो था, बस कभी कभी ओवर द टॉप डायलॉग्स और सांग्स मज़ा खराब कर रहे थे।

Friday, 27 April 2018

लखनऊ बुक फेयर का आगाज़ हो गया है

आज बड़ी व्यस्तता थी। पहले पहल तो यही सोच रहा था कि क्या आज काम खत्म होगा भी या नहीं। खैर आज सुबह जब अखबार पढ़ा तो ये एहसास हुआ कि आखिरकार अखबार पढ़ना क्यों अच्छा है।

आजकल अखबार में शहर में होने वाली प्रमुख घटनाओं के बारे में लिखा होता है। जैसे फला मंत्री वहां आएंगे, या फला संतरी वहां जाएंगे। वैसी ही एक घटना पर मेरी निगाह पड़ी जिसमें ये लिखा था कि आज लखनऊ बुक फेयर शुरू होने जा रहा है।


अब मुझ जैसे किताबी कीड़े को और क्या चाहिए? पढ़ने को एक किताब हो और चाय का प्याला, ये गठजोड़ बेहद निराला है। वैसे चाय तो वहां थी पर पीने का दिल नहीं किया।


जैसे ही कदम अंदर पड़े तो उस खुले बाग में ऐसा लगा जैसे वो सारी किताबें मुझे बुला रही हों। एक एक कर लगभग सारे स्टाल्स पर गया, पर जिस किताब की उम्मीद थी वो वहां मिली ही नहीं।



मुंबई हो या दिल्ली, चेन्नई हो या लखनऊ, हर जगह की किताबें वहां दिखी।


जिस चीज़ ने मुझे हँसा दिया वो था रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया का स्टाल जहां के अधिकारी समय के पाबंद थे। शाम के आफिस के समय की समयसीमा समाप्त थी और उनकी सेवाएं भी।

कुछ यही हाल आल इंडिया रेडियो के स्टाल पर भी था जहां कोई था ही नहीं। वो जैसे बस में रुमाल डालकर हम सीट पर कब्ज़ा कर लेते हैं कुछ वैसा ही आलम वहां की कुर्सियां भी बयां कर रही थी। अगर कोई आकर पूछे तो ये कहा जा सकता है कि सर मेरा बैग था, मतलब मैं उपस्थित था।

















मेरठ से आए हुए स्टाल ने मेरा ध्यान अपनी तरफ खींचा और उनकी सुंदर कृतियाँ देखकर बेहद अच्छा लगा।


पर एक बुक फेयर में हैंडलूम स्टाल कुछ समझ नहीं आया।



वैसे अगर आप शहर में है तो इस बुक फेयर में ज़रूर जाएं क्योंकि किताबें सबसे अच्छी दोस्त होती हैं।

आखिरकार नाटक देखने का टर्न आ ही गया

नाटक एक ऐसी विधा है जिसमें जाने के बाद आप उससे दूर नहीं रह सकते। आप अनायास ही उसकी तरफ खिंचे चले जाते हैं।

पिछले हफ्ते मंगलवार की देर शाम मुझे ये पता चला कि आज एक नाटक 'टर्न' होने वाला है। बस फिर क्या था, मैंने प्लान बनाने शुरू किए और इस नाटक का आनंद लिया।


नाटक की कहानी दो बुजुर्ग लोगों के इर्द गिर्द है जो अपने जीवनसाथी खो चुके हैं और मुंबई में रहते हैं। वहां कि दौड़ भाग भरी जिंदगी, मुझे अपनी स्पेस चाहिए की जद्दोजहद और फ्रीडम की लड़ाई।


नाटक में दोनों अपने खाली पड़े वक्त को काटने की कोशिश करते हैं। आभा अभी पुणे से आई है और अपने बच्चे निशांत के साथ रहती है। उसी फ्लैट में उसके साथ लिवइन रिलेशनशिप में रह रही महिला मित्र भी है जो निशांत की माँ से हर सुबह लड़ती है। इस चक्कर में आभा का गाने का क्रम बंद हो चुका है और वो अब बालकनी पर खड़े होकर चाय भी नहीं पीती।

वहीं दूसरी तरफ सामने के घर में एक रिटायर्ड पिता है जिसकी बिटिया अभी दूसरे शहर से आई है और वो चाहती है कि उसकी शादी होने से पहले उसके पिता दोबारा शादी कर लें।

आजतक अपनी बेटी की हर मांग खुशी खुशी पूरी करने वाले ये पिता अपनी बच्ची से इस सवाल की वजह पूछते हैं तो उन्हें ये खबर होती है कि वो एक लड़के को पसन्द करती है और वो जल्द ही उसका हाथ मांगने उनके पास आएगा।


बिटिया फिर जिद करती है कि उसके पिता अपनी अच्छी महिला मित्र वृंदा जी से शादी कर लें, पर पिता उसे नकार देते हैं।

अपने हालातों से जूझते ये दो लोग कैसे एक दूसरे में अपने आराम का रास्ता तलाश लेते हैं, और कैसे उनकी ज़िंदगी एक टर्न लेती है, ये कहानी उसके बारे में है।


नाटक बहुत ही खूबसूरत था, पर उसकी तस्वीरें शायद उतनी खूबसूरत ना हो। मुझे इस नाटक के अंत में अपनी एक कविता की पंक्तियां याद आ गई:

कौन भला किसका जीवनसाथी है,
ये अफसाना है, जिसकी मियाद बाकी है,
जब ज़िन्दगी के कारवाँ को चलते ही रहना है,
तो ये ना कहिए कुछ खत्म हुआ, कहिए अभी बात बाकी है।

- शुक्ला